देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा मुद्दा गरमाया हुआ है। आगामी विधानसभा सत्र 9 से 13 मार्च तक चलने वाला है, जहां राज्यपाल का अभिभाषण प्रस्तावित है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पांच साल के कार्यकाल में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कभी सोमवार के प्रश्नकाल में खुद जवाब नहीं दिया। यह परंपरा टूटने से लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रश्नकाल विधानसभा का वो हिस्सा है जहां विधायक सरकार से सीधे सवाल पूछते हैं। यह जनता की परेशानियों को हल करने का सबसे मजबूत जरिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीएम जैसे नेता, जो गृह, वित्त, राजस्व, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन जैसे 15 से ज्यादा विभाग संभालते हैं, उनकी मौजूदगी जरूरी है। बिना उनके जवाब मंत्री देते हैं, जो पारदर्शिता की कमी दिखाता है। पिछले सत्रों के आंकड़े बताते हैं कि 70% से ज्यादा महत्वपूर्ण सवालों पर सीएम की अनुपस्थिति रही। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। उनका कहना है कि प्रश्नकाल सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि नीतियों की समीक्षा का मौका है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भी सत्र की अवधि बढ़ाने का पत्र लिखा।\
प्रदेश में महिला अपराध 25% बढ़े हैं (एनसीआरबी डेटा), बेरोजगारी दर 8% के पार, भर्ती घोटाले और महंगाई जैसे मुद्दों पर चर्चा के लिए समय कम पड़ रहा। यह सत्र सिर्फ 5 दिन का है, जो इन ज्वलंत समस्याओं के लिए नाकाफी लगता है। अगर सीएम सत्र में नजर नहीं आएंगे, तो जनता का सरकार से भरोसा कम हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में आपदा प्रबंधन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर सीएम की सीधी जवाबदेही जरूरी है। इससे विपक्ष को मजबूती मिलती है और सरकार की छवि प्रभावित होती है। लोकतंत्र में संवाद ही ताकत है – अगर यह टूटा, तो शासन की नींव हिल सकती है।
कांग्रेस की प्रमुख मांगें हैं, जिनमें सबसे पहली मांग सीएम नियमित रूप से प्रश्नकाल में उपस्थित हों और खुद जवाब दें। दूसरी बड़ी मांग लंबित जनहित सवालों पर विस्तृत बहस हो। तीसरी मांग सत्र की लंबाई बढ़ाकर सभी मुद्दों पर चर्चा संभव बने। चौथी और अंतिम मांग प्रश्नकाल की परंपरा मजबूत की जाए। यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि हर नागरिक के हक का है। सरकार अगर संवाद से बचेगी, तो जनता सवाल जरूर पूछेगी।

