देहरादून,। भगवान नेमिनाथ के जीवन में निहित अहिंसा, करुणा और वैराग्य के संदेश को आत्मसात कराते हुए सोमवार को नगर में भगवान नेमिनाथ की भव्य बारात निकाली गई। धार्मिक उल्लास और भक्तिभाव से सराबोर बारात में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। भजनों और धार्मिक झांकियों ने वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया। प्रातः छह बजे प्रिंस चौक से श्रीजी एवं पूज्य आर्यिका पूर्णमति माताजी का पंडाल की ओर मंगल प्रस्थान हुआ। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने विधिविधानपूर्वक श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा की।
श्री नेमिनाथ विधान के अंतर्गत ‘नेमिकुमार, बलराम एवं श्रीकृष्ण वार्ता’ विषय पर लघु नाटिका का परिवार के सदस्यों ने भावपूर्ण मंचन किया। नाटिका के माध्यम से भगवान नेमिनाथ के जीवन और उनके वैराग्य भाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिसे देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। दोपहर 11 बजे हिंदू नेशनल स्कूल से भगवान नेमिनाथ की भव्य बारात प्रारंभ हुई। बारात में पांच बैंड, 15 आकर्षक झांकियां, पाइप बैंड, मोर की झांकी और 20 ई-रिक्शा शामिल रहे। दिल्ली, गुरुग्राम, पंजाब सहित विभिन्न स्थानों से आए बैंड दलों ने भक्ति गीतों और मधुर धुनों की प्रस्तुति से वातावरण को धर्ममय बना दिया।
श्रद्धालु भजनों पर झूमते हुए भगवान नेमिनाथ के जयकारे लगाते रहे। बारात में विकासनगर, ऋषिकेश, मध्य प्रदेश, सहारनपुर, दिल्ली, राजस्थान और रुड़की सहित विभिन्न स्थानों से आए श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बारात सहारनपुर चौक, झंडा बाजार, रामलीला बाजार, पीपल मंडी चौक, राजा रोड, प्रिंस चौक और जैन धर्मशाला होते हुए पुनः सहारनपुर चौक से पंडाल पहुंची। पशुओं की करुण पुकार सुन जागा वैराग्य बारात के पंडाल पहुंचने के बाद पूज्य आर्यिका पूर्णमति माताजी ने भगवान नेमिनाथ के जीवन के वैराग्य प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि भगवान नेमिनाथ का विवाह जूनागढ़ के राजा उग्रसेन की पुत्री राजकुमारी राजुल (राजीमती) के साथ तय हुआ था। विवाह के लिए जब नेमिनाथ जी की बारात द्वारका से जूनागढ़ पहुंची तो विवाह भोज के लिए बड़ी संख्या में पशुओं को बाड़े में बांधकर रखा गया था। माताजी ने बताया कि पशुओं का भय, कंपन और करुण क्रंदन सुनकर नेमिनाथ जी का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने सारथी से पशुओं के तड़पने का कारण पूछा। सारथी ने बताया कि विवाह भोज के लिए इन निरीह जीवों की बलि दी जाएगी। यह सुनकर भगवान नेमिनाथ के अंतर्मन में वैराग्य का उदय हुआ।
उन्होंने अनुभव किया कि निर्दोष जीवों की हिंसा पर आधारित सांसारिक सुख वास्तविक सुख नहीं हो सकता। करुणा के सागर भगवान नेमिनाथ ने तत्काल अपना रथ वापस मोड़ दिया और राजसी वैभव, विवाह तथा सांसारिक मोह का त्याग कर गिरनार पर्वत की ओर तप एवं आत्मसाधना के मार्ग पर अग्रसर हो गए। उनका जीवन समस्त मानवता को अहिंसा, जीवदया, त्याग और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है। महाआरती के बाद गूंजे भक्ति के स्वर सायं सात बजे श्रीजी की भव्य महाआरती की गई। इसके पश्चात आयोजित भजन संध्या में भजन सम्राट रूपेश जैन ने अपनी सुमधुर प्रस्तुतियों से श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर कर दिया।
उन्होंने पूज्य माताजी एवं आचार्य विद्यासागर जी महाराज को समर्पित भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। देर शाम तक पंडाल में भक्ति और आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहा। भगवान नेमिनाथ की बारात और वैराग्य प्रसंग ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि सच्चा धर्म केवल उत्सव मनाने में नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, अहिंसा और आत्मशुद्धि के भाव को जीवन में उतारने में है।
